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छोटी सी दुकान से हुई थी हल्दीराम की शुरुआत, आज बन गया ब्रांड, जनिए कौन थे इसके मालिक

आमतौर पर घरों में हल्दीराम की मिठाइयों और नमकीन का प्रयोग हर तीज-त्योहार पर किया जाता है। इसका कारण है स्वाद। लोगों को हल्दीराम के उत्पादों का अनोखा स्वाद काफी पसंद आता है। लेकिन क्या आपको पता है जिस हल्दीराम को आज हम ब्रांड के रुप में देखते हैं उसकी शुरुआत एक छोटी सी दुकान से हुई थी।

पारिवारिक बिजनेस को संभाला

गुजरात के बीकानेर निवासी भीखाराम के घर साल 1908 में एक बालक का जन्म हुआ था जिसे उसकी मां हल्दीराम कहकर बुलाती थी। हालांकि, इसका असली नाम गंगा बिशन अग्रवाल था। हल्दीराम के दादा भीखाराम बीकानेर में “भीखाराम चांदमल” नामक एक दुकान चलाते थे। इस दुकान में भुजिया और आदि नाश्ते की चीजें बिकती थीं। बचपन से भुजिया का व्यापार देखकर बड़े हुए हल्दीराम कम उम्र में ही दुकान चलाने लगे थे। 11 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई जिसके बाद जिम्मेदारियों का बोझ उनके कंधों पर आ गया था।

इसलिए हल्दीराम ने पारिवारिक व्यापार में हाथ बंटाना शुरु कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने भुजिया बनाना सीखा। उन्होंने देखा कि बाजार में बिकने वाली भुजिया और उनकी भुजिया समान ही थी। इसलिए उन्होंने भुजिया में मोठ की मात्रा को बढ़ा दिया। उस भुजिया का स्वाद उनके ग्राहकों को काफी पसंद आने लगा था। अब हल्दीराम भी बड़ें हो रहे थे। यही कारण था कि परिवार में लोगों के बीच बन नहीं रही थी। इसलिए उन्होंने परिवार से दूरी बना ली और अपना बिजनेस शुरु कर दिया।

साल 1937 में हल्दीराम ने बीकानेर में एक छोटी सी नाश्ते की दुकान खोली। जहां बाद में उन्होंने भुजिया बेचना इस दुकान में वे नाश्ते के साथ-साथ भुजिया भी बेचते थे। धीरे-धीरे इस दुकान से मार्केट में उनकी पहचान बनने लगी थी। हल्दीराम हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि ग्राहकों को कुछ ऐसा खिलाया जाए जिससे उनकी भुजिया हिट हो जाए। इसलिए वे हमेशा एक्सपेरिमेंट करते रहते थे।

अभी तक मार्केट में जो भुजिया आती थी वह नरम, मोटी और गठिये की तरह होती थी लेकिन हल्दीराम ने इसके स्वरुप को ही बदल डाला। उन्होंने ने एकदम पतली भुजिया बनाना शुरु किया। यह भुजिया स्वाद में काफी चटपटी और क्रिस्पी हुआ करती थी। मार्केट में लोगों को उनकी भुजिया काफी पसंद आने लगी थी। यही कारण था कि उनकी दुकान को लोग ‘भुजिया वाला’ के नाम से जानने लगे थे। बाद में उन्होंने इस दुकान का नाम अपने नाम पर रख दिया और इसका नाम हो गया हल्दीराम।

कोलकाता में खोला बिजनेस

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हल्दीराम शुरुआत से कुछ बड़ा करना चाहते थे। इसी उद्देश्य से एक बार वे कोलकाता एक शादी में आए थे। इस दौरान उन्होंने अपनी भुजिया का स्वाद सभी रिश्तेदारों को चखाया। उन्होंने हल्दीराम को सलाह दी कि वे क्यों न कोलकाता में भी अपनी एक ब्रांच खोल लें। हल्दीराम को उनका यह आइडिय़ा काफी पसंद आया। उन्होंने एक ब्रांच यहां भी खोल दी। धीरे-धीरे उनका बिजनेस चल निकला।

नागपुर और दिल्ली में हुई व्यापार की शुरुआत

कुछ समय बाद उनका यह बिजनेस उनके पोते शिव कुमार और मनोहर ने संभाला। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से इस कारोबार को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया। सबसे पहले हल्दीराम का एक स्टोर 1970 में नागपुर में खोला गया था। इसके बाद 1982 में देश की राजधानी दिल्ली में दूसरा स्टोर खोला गया। दोनों जगहों पर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स लगाए गए। इसके बाद पूरे देश में हल्दीराम के प्रोडक्ट्स बिकने लगे थे।

गौरतलब है, हल्दीराम का बिजनेस अब पूरी दुनिया में हो रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, तकरीबन 80 देशों में इसका बिजनेस धड़ल्ले से चल रहा है जिनसे कंपनी को हज़ारों करोंड़ रुपयों की आमदनी होती है।

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