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कभी 5000 रुपयों के लिए फैलाना पड़ा था हाथ, आज है अरबों की कीमत वाले ब्रांड का मालिक, जानिये Airtel के मालिक की कहानी

आमतौर पर लोगों का मानना होता है कि अमीरों के बच्चों को किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होती है। उन्हें उनके एक हुक्म पर दुनिया जहां की सारी खुशियां मिल जाती हैं। कई बार लोगों की ये धारणाएं सच भी साबित होती हैं लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता है। अमीरों के बच्चों को भी अपने करियर को बनाने के लिए उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना कि एक गरीब या मिडल क्लास फैमिली के बच्चे को।

पिता की तरह नहीं संभाली राजनीति की गद्दी

इसका प्रबल उदाहरण हम सबके सामने Airtel ब्रांड के रुप में है। इसकी स्थापना सन् 1992 में सुनील भारती मित्तल द्वारा की गई थी। इनके पिता पंजाब के सुप्रसिद्ध नेता थे जिनका नाम सत पॉल मित्तल था। इनके घर में दौलत का अपार भंडार था लेकिन सुनील को पिता के पैसों पर राज करना गवारा नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा मंसूरी के एक स्कूल से खत्म करने के बाद पंजाब यूनिवर्सिटी के आर्य कॉलेज से 1976 में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की और राजनीति करने की बजाए बिजनेस में उतरने का फैसला किया।

उन दिनों लुधियाना का नाम साइकिल पार्ट्स बनाने के लिए काफी फेमस था। इसलिए सुनील ने भी इसी बिजनेस में हाथ आज़माने का फैसला किया। पिता से करीब 20,000 रुपये लेकर शुरु किया गया यह कारोबार चल पड़ा। इस दौरान उनकी मुलाकात हीरो साइकिल्स के मालिक बृज मोहन लाल मुंजाल से हुई। इनके साथ सुनील की नजदीकियां बढ़ने लगी।

एक समय ऐसा आया कि सुनील का साइकिल पार्ट्स बनाने का कारोबार ठीक चलने लगा था, लेकिन उन्हें ठीक नहीं बल्कि कुछ बड़ा करना था। इसलिए सुनील ने साइकिल पार्ट्स के व्यापार से हटकर 1979 में अपने भाई राकेश और राजन मित्तल के साथ मिलकर जापान से आयात होने वाले पोर्टेबल जनरेटर का व्यापार शुरु किया। इसकी शुरुआत मुंबई से हुई। साल 1982 तक सब ठीक चल रहा था। हालांकि, तत्कालीन सरकार ने पोर्टेबल जनरेटर पर इंडिया में रोक लगा दी, जिसके बाद सुनील के इस बिजनेस पर भी गृहण लग गया।

आयात के व्यापार पर लगी रोक

इस सबके बावजूद सुनील ने हार नहीं मानी। उन्होंने ठान लिया था कि वे एक दिन बड़े आदमी जरुर बनेंगे। इसलिए साल 1986 में उन्होंने पुश बटन फोन को इंपोर्ट करने का फैसला किया। इन फोन को ताइवान से लाकर भारत में बेचा जाता था। इसके लिए सुनील ने बीटल नाम के एक ब्रांड की शुरुआत की। धीरे-धीरे उनका यह काम चल निकला। इसके साथ उन्होंने फैक्स मशीन और अन्य दूरसंचार उपकरण बनाना शुरु कर दिया था।

अभी तक सुनील की जिंदगी में सब कुछ नॉर्मल चल रहा था लेकिन वे हमेशा से कुछ बड़ा करना चाहते थे। यह मौका उन्हें साल 1992 में मिला। जब तत्कालीन भारत सरकार ने पहली बार मोबाइल सेवा के लिए लाइसेंस बांटने शुरू किए। सुनील ने इस मौके का फायदा उठाते हुए विवेंडी नामक फ्रेंच कंपनी के साथ मिलकर दिल्ली और आस-पास के इलाकों के सेल्युलर लाइसेंस प्राप्त कर लिया।

एयरेटल का जन्म

इसके बाद 1995 में सुनील ने सेल्युलर सेवाओं की पेशकश के लिए भारती सेल्युलर लिमिटेड की शुरुआत की और इस तरह जन्म हुआ एयरटेल ब्रांड का। शुरुआत में इस कंपनी के पास 20 हजार ग्राहक थे जो कुछ दिनों में 20 लाख हुए इसके कुछ दिनों बाद 20 करोंड़ हो गए। धीरे- धीरे ये कारवां बढ़ता गया और सुनील ने देश की कई अन्य सेल्युलर कंपनीज़ का अधिग्रहण कर लिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनील को सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली जब उनकी कंपनी एयरटेल बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट की गई। बताया जाता है कि साल 2008 तक भारत में एयरटेल के 6 करोड़ कस्टमर्स हो चुके थे। इसी के साथ इस कंपनी की वैल्यूएशन 40 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी।

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