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रेडलाइट एरिया में जन्म लेने वाली इस लड़की ने रचा इतिहास, अमेरिका ने माना इसे समाज के लिए प्रेरणा स्त्रोत

हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म गंगूबाई काठियावाड़ी एक ऐसे विषय पर आधारित है जिसने मुंबई के रेडलाइट एरिया की कहानी को दुनिया के सामने बड़ी सहजता के साथ प्रदर्शित किया है। इस फिल्म में मशहूर फिल्म अभिनेत्री आलिया भट्ट ने अहम किरदार निभाया है। उन्होंने गंगूबाई बनकर दर्शकों के दिल जीत लिया।

इस बात से तो आप सब वाकिफ ही हैं कि यह फिल्म एक सत्य घटना पर आधारित है। इसमें काठियावाड़ की मशहूर राजनेत्री गंगूबाई की कहानी दिखाई गई जिन्हें धोखे से इस देह व्यापार में झोंक दिया जाता है। बहरहाल, आज हम आपको एक ऐसी महिला के विषय में बताने जा रहे हैं जिसका जन्म भी रेडलाइट एरिया में हुआ था। लेकिन आज वह अमेरिका जैसे देश के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गई है। आखिर एक साधारण महिला कैसे इतनी ऊंचाइयों पर पहुंच गई यह जानना काफी दिलचस्प होगा।

हम बात कर रहे हैं मुंबई के रेडलाइट एरिया में जन्म लेने वाली श्वेता कट्टी की। इन्होंने अपने टैलेंट और लगन के दमपर अमेरिका में अपनी पहचान स्थापित की।

कमाठीपुरा में जन्मी श्वेता

बता दें, श्वेता का जन्म मुंबई के कमाठीपुरा में हुआ था। उन्होंने अपना पूरा बचपन इन्हीं गलियों में गुजारा। वे अपनी तीन बहनों में सबसे छोटी थीं। वे इस नर्क से निकलना चाहती थीं। वे बचपन से ही सपनों की उड़ान भरना चाहती थीं। वे पढ़-लिखकर कमाठीपुरा के दल-दल से बाहर निकलना चाहती थीं।

लेकिन इन गलियों को छोड़कर आसानी से निकलना इतना आसान कहां था। उनकी मां 5500 रुपये प्रति माह के वेतन पर एक फैक्ट्री में मजदूरी करती थी। वह जैसे-तैसे अपने बच्चों को पालती पोसती थी। श्वेता बताती हैं कि उन्होंने बचपन से ही बहुत दर्द झेले। जब वे 9 साल की थीं तब उनके ही एक करीबी ने उनका शारीरिक शोषण किया था। श्वेता ने बताया कि बचपन में उनका 3 बार शारीरिक शोषण हुआ था।

बताया जाता है कि श्वेता को उनके रंग को लेकर भी स्कूल में बच्चे काफी चिढ़ाते थे। वे उन्हें गोबर कहकर बुलाते थे। लेकिन वे सबकुछ चुपचाप सहती थीं। धीरे-धीरे श्वेता बड़ी हो रही थीं और उन्हें खुद से घृणा होने लगी थी। वे खुद को दुनिया का सबसे खराब इंसान मानने लगी थीं। इस बीच साल 2012 में उन्होंने क्रांति नामक एक एनजीओ ज्वाइन किया था। इस एनजीओ को ज्वाइन करने के बाद उनकी जिंदगी बदलने लगी थी। एनजीओ के लोगों के साथ रहते हुए उन्हें खुद से प्यार होने लगा था। वे अपने लिए कुछ करना चाहती थीं।

अमेरिकी मैगजीन में छपा श्वेता का नाम

कहा जाता है कि श्वेता ने इस एनजीओ की मदद से अपने ऐसी 25 अन्य महिलाओं की जिंदगी संवारी। उनके इस कार्य से प्रभावति होकर अमेरिकी मैगज़ीन न्यूज़वीक ने साल 2013 में उन्हें अपने अप्रैल अंक में 25 साल से कम उम्र की उन 25 महिलाओं की सूची में शामिल किया था। ये महिलाएं समाज के लिए प्रेरणास्त्रोत के रुप में चुनी गई थीं। इनमें पाकिस्तान की मलाला यूसुफज़ई का नाम भी शामिल था।

अमेरिका जाकर पढ़ने का मिला मौका

गौरतलब है, श्वेता का सपना था कि वे अमेरिका जाकर पढ़ाई करें। उनका यह सपना तब पूरा हुआ जब इंटरनेट पर उनकी मुलाकात अमेरिका के बॉर्ड कॉलेज से पासआउट एक छात्र से हुई। वह श्वेता के कारनामों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपने कॉलेज में स्कॉलरशिप के लिए उनकी सिफारिश कर डाली। कुछ दिनों बाद श्वेता को खबर मिली कि कॉलेज की तरफ से उन्हें 28 लाख रुपये की स्लरशिप दी जाती है। आज श्वेता कमाठीपुरा की गलियों से निकलकर अमेरिका की सड़कों पर घूम रही हैं। वे अपने सपनों को पूरा कर रही हैं। वाकई में वे अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं।

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