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जानिए पारले बिस्कुट की शुरुआत कब और कैसे हुई,आजादी से पहले दिया था विदेशी कंपनियों को टक्कर.

आज भारत हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है और हम अनेक तरह का आविष्कार कर रहे है।.बात अगर पारले बिस्कुट की करें तो। यह भारत की बहुत पुरानी कंपनी है.यह भारत की आजादी से पहले न सिर्फ घर घर से विदेश की कंपनी को हटाए बल्कि उसका सफाया कर दिए.

पारले की शुरआत

पार्ले कंपनी की बात करें तो इसकी शुरुआत साउथ गुजरात से होती है सन उन्नीस सौ के दशक में एक लड़का मुंबई अपने काम की तलाश में आया और वहां पर उसने सिलाई सीखने का काम किया उसका मात्र एक ही टारगेट था किवा जल्द से जल्द सिलाई सीखे और कपड़े की दुकान खोलें हम बात कर रहे हैं मोहन लाल की और 6 साल बाद इस लड़के ने मुंबई में एक कपड़े की दुकान खोली मोहनलाल चौहान के पांच बेटे थे. मानेक लाल, पीतांबर, निरोत्तम, कांतिलाल और जयंतीलाल. मोहनलाल अपने बच्चे को एक बिजनेसमैन बनाना चाहते थे और उन्होंने अपने बच्चों को बचपन से ही बिजनेस के गुर सिखाना शुरू कर दिए थे

मोहनलाल का मानना था कि उनके बच्चे उनके बिजनेस को आगे बढ़ाएं लेकिन वक्त बदला हालात बदले और मोहन लाल ने इस बिजनेस के बदले दूसरा बिजनेस शुरू करना चाहा मोहनलाल और मोहन लाल ने पारले जी बिस्किट कंपनी से पहले चॉकलेट बनाने के बारे में सोचा और उस समय भारत में कोई भी कंपनी चॉकलेट नहीं बना रही थी मोहनलाल के सामने एक बड़ी चुनौती थी कि वह एक चॉकलेट कंपनी की स्थापना कैसे करें साथ ही मोहनलाल ने यह सभी सुविधा ना होने की वजह से जर्मनी जाने का फैसला किया और जर्मनी जाकर चॉकलेट की कंपनी के बारे में पता लगाया और कुछ मशीनें साथ में भी लेकर चले आए. इसके बाद चौहान परिवार ने महाराष्ट्र में स्थित एक फैक्ट्री लगाई और इसका नाम दिया हाउस ऑफ पार्ले
बेटों ने दी बिजनेस को नई ऊर्जा.

मोहनलाल के सभी बेटों ने पार्ले कंपनी को अपने दिमाग से आगे बढ़ाते हुए एक नई सोच के साथ देश को सबसे पहले कैंडी चॉकलेट दी उसके बाद इनके पांचों बेटों ने सकारात्मक सोच के साथ देश में एक ऐसा बिस्कुट लाने के बारे में सोचा जिसमें हर वर्ग के लोग इस बिस्कुट का स्वाद चख सके एक समय ऐसा था जब अमीरों की टेबल पर केवल पारले जी बिस्कुट ही दिखता था. इसी सोच के साथ पारले ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पारले ग्लूकोस लॉन्च कर दिया.

पारले का बिस्कुट देश में धीरे धीरे अपनी जगह बनाता चला गया इस बिस्कुट का दाम इतना सस्ता था. कि इसे हर वर्ग के लोग खरीद सकते थे क्योंकि जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था तो उस समय विदेशी कंपनियां जैसे ब्रिटानिया बहुत महंगा बिस्किट तैयार करती थी जिससे मध्यम और गरीब वर्ग के परिवारों को बिस्किट खरीदने के लिए सोचना पड़ता था.लेकिन पारले ने इन सभी चुनौतियों का सामना करते हुए आज देश की सबसे पुरानी कंपनियों में से एक हैं.और भारत की आजादी से पहले विदेशियों कंपनी को जवाब दिया की हम भारतीय व्यापार भी कर सकते हैं.

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