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वो संत जिसके आगे इंदिरा गांधी से लेकर पश्चिमी देशों तक हज़ारों दिग्गज झुकते थे, जानिये महिर्षि महेश योगी की कहानी

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासतों ने हमेशा दुनिया पर राज किया है। यहां की सनातन पद्धित ने विश्वभर में लोगों को प्रभावित किया है। यही कारण है आज भी हिंदुत्व को मानने वालों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। हिंदू धर्म को लोकप्रिय बनाने में सबसे बड़ा योगदान भारत के ऋषि-मुनियों का रहा है। उन्होंने धर्म की स्थापना और उसको बढ़ावा देने के लिए निरंतर तप किया है।

आज हम आपको एक ऐसे संत-महात्मा के विषय में बताने जा रहे हैं जिन्होंने देश की प्रधानमंत्री से लेकर पश्चिमी देशों के तमाम नागरिकों को ज्ञान का मार्ग प्रशस्त किया। इन महान संत का नाम महर्षि महेश योगी था। इन्होंने अपने आध्यात्मिक विचारों से इतनी प्रसिद्धि प्राप्त की थी कि इनके आगे पूरी दुनिया झुकती थी।

story about maharishi mahesh yogi

बता दें, महर्षि महेश योगी ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन के लिए पूरी विश्व में प्रख्यात थे। इनके असली नाम और जन्म स्थान को लेकर आज भी लोगों में संशय बना हुआ है। कुछ लोग दावा करते हैं कि महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1917 को हुआ था। बताया जाता है कि उनका असली नाम महेश प्रसाद वर्मा था जबकि कुछ लोग उन्हें श्रीवास्तव मानते हैं। वहीं, उनके जन्म स्थान को लेकर कुछ लोग दावा करते हैं कि महर्षि का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर के राजिम शहर के पास पांडुका गांव में हुआ था जबकि कुछ उन्हें जबलपुर का बताते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महर्षि महेश योगी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से फिजिक्स में ग्रेजुएशन कंप्लीट किया था। इसके अलावा 13 साल तक वे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती की छत्रछाया में रहे। यहां उन्होंने शिक्षा और दीक्षा प्राप्त की। कहा जाता है कि स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने ही उन्हें बाल ब्रह्मचारी की उपाधि दी थी। बस तभी से उन्हें योगी नाम से पहचाना जाने लगा।

कई रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि महेश योगी के गुरू शंकराचार्य स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती ने देह त्यागने से पहले अपनी वसीयत में लिखा था कि वे अपना उत्तराधिकारी महेश योगी को बनाते हैं। हालांकि, कई धर्म संतों ने इस बात का विरोध किया था। लोगों का कहना था कि वे एक कायस्थ हैं जबकि इस गद्दी पर सिर्फ एक ब्राह्मण ही बैठ सकता है।

वैश्विक योग गुरू का दर्जा प्राप्त कर चुके महेश योगी ने यूरोप के कुछ हिस्सों में राम नाम से अपनी करेंसी चलाई थी, जो भी कई जगहों पर वैद्य है। साल 60-70 के दशक में महर्षि ने राम नामक मुद्रा का चलन प्रारंभ किया था। इसके अलावा साल 2002 में महर्षि की संस्था ‘ग्लोबल कंट्री वर्ल्ड ऑफ पीस’ ने इसे जारी किया था जिसे नीदरलैंड्स ने 2003 में मान्यता दे दी थी। इसमें 1, 5 और 10 के नोट शामिल थे।

गौरतलब है, महर्षि महेश योगी के पूरी दुनिया में असंख्य भक्त थे। इनमें भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा तक शामिल थे।

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