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पाकिस्तान में हटाई गई महान सिख योद्धा हरि सिंह नलवा की प्रतिमा, भारत में हो रहा विरोध

पाकिस्तान अपने नापाक इरादों से बाज़ नहीं आ सकता है। हर बार हिंदुस्तान से मुंह की खाने के बावजूद पाकिस्तान की इमरान सरकार कुछ ना कुछ ऐसा कर देती है जिससे लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान में महान सिख योद्धा हरि सिंह नलवा की प्रतिमा का अपमान किया गया है। बताया जा रहा है कि इस प्रतिमा को वहां से हटा दिया गया है।

पाकिस्तान में हटाई गई हरि सिंह नलवा की प्रतिमा

Statue of great Sikh warrior Hari Sin

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में हरिपुर जिले के हरिपुर चौक पर स्थापित हरि सिंह नलवा की मूर्ति को उखाड़ कर फेंक दिया गया है। माना जाता है कि इस शहर को जनरल हरि सिंह नलवा द्वारा ही बसाया गया था। उनके सम्मान में यहां के निवासियों ने साल 2017 में इस मूर्ति को यहां लगाया था जिसको अब पाकिस्तान सरकार के सरपरस्त दहशतगर्दों ने उखाड़ कर फेंक दिया है। आज हम आपको हरि सिंह नलवा के विषय में बताएंगे कि आखिर वे कैसे इतने महान सिख योद्धा कहलाए।

1791 में हुआ था जन्म

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, हरि सिंह नलवा का जन्म सन 1791 में पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था। इनके पिता का नाम सरदार गुरदियाल सिंह उप्पल था और माता का नाम धरम कौर था। हरि सिंह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे। उनका लालन-पालन बड़े ही प्यार से किया गया था।

कहा जाता है कि सात साल की उम्र में हरि सिंह के सिर से उनके पिता का साया उठ गया था। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं के नन्हे कंधों पर आ गई थी।

10 की उम्र में सीखी युद्धविद्या

10 साल की उम्र में उन्होंने अमृतपान किया और सच्चे सिख बन गए। इसके बाद उन्होंने अस्त्र-शस्त्र, धनुर्विद्या, घुड़सवारी आदि सीखना प्रारंभ किया। कुछ ही सालों में वे अपने कौशल में इतना निपुण हो गए कि उन्होंने इसका नमूना महाराज रणजीत सिंह को दिखाया और अपना मुरीद बना लिया।

1805 ईं. में महाराज रणजीत सिंह ने बसंत पंचमी के उपलक्ष में प्रतिभा खोज प्रतियोगिता का आयोजन किया था। इस प्रतियोगिता में हिर सिंह ने भी भाग लिया उस वक्त वे महज़ 12 साल के थे।

14 की उम्र में बने सेनानायक

इस दौरान उन्होंने अपने हुनर का प्रदर्शन करके महाराजा रणजीत सिंह को काफी प्रभावित किया जिसके बाद उन्हें राजा के दरबार में खास सहायक का पद प्राप्त हुआ। लेकिन हरि सिंह का मन इससे नहीं भरा उन्हें युद्धभूमि में अपने हुनर का इस्तेमाल करना अच्छा लगता था। यही कारण था कि महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें 800 सैनिकों का सेनानायक घोषित कर दिया। महज़ 14 साल की उम्र में हरि सिंह इतनी बड़ी सेना की कमान संभाल रहे थे। इसके अलावा वे जंग में दुश्मनों के साथ दो-दो हाथ भी करते थे और उन्हें धूल भी चटाते थे।

बाघ ने कर दिया था हमला

उनके युद्ध कौशल से प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने हरि सिंह को अपने साथ शिकार पर ले जाना प्रारंभ किया। एक बार राजा शिकार करने के लिए जंगल जा रहे थे कि एक जंगली बाघ ने उनपर हमला कर दिया। इस दौरान हरि सिंह ने राजा को तो बचा लिया लेकिन खुद पर हमला करने से बाघ को नहीं रोक पाए। उस जंगली जानवर ने उनपर हमला इतना अप्रत्याशित ढंग से किया कि वे जब तक समझते-समझते बाघ उनके सामने मुंह फाड़े खड़ा था।

नलवा नाम से हुए प्रसिद्ध

कहा जाता है कि बाघ को देखकर निहत्तथे हरि सिंह घबराए नहीं। उन्होंने उसका जबड़े को पकड़कर उसका वध कर दिया और सभी की जान बचाई। उनकी इस बहदुरी के लिए उनका नाम नलवा पड़ गया। बस तभी से लोगों ने हरि सिंह को हरि सिंह नलवा कहना प्रारंभ कर दिया।

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