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पर्यावरण को संरक्षित करने में लगा दिया पूरा जीवन, हुई पद्म श्री से सम्मानित

इस वर्ष गणतंत्र दिवस के मौके पर केंद्र सरकार ने अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ योगदान देने वालों को पद्म पुरुस्कार देकर सम्मानित किया। इनमें एक नाम बसंती देवी का भी है। इन्हें भी गणतंत्र दिवस समारोह में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उत्तराखंड के कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम में रहने वाली बसंती देवी को यह सम्मान उनके पर्यावरण के क्षेत्र में उनके द्वारा दिए गए उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया।

बता दें, बढ़ती आबादी आज पर्यावरण के लिए मुसीबत बन गई है। यही हाल उत्तराखंड में भी है। राज्य की कोसी नदी का पानी लाखों लोगों के लिए जीवन का आधार बन चुकी है। ऐसे में इस नदी से ही आर्मी कैन्टोनमेंट और अन्य शहरों तक पानी पहुंचाया जाता है। जिसकी वजह से नदी के बहाव में कमी दर्ज की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नदी के बहाव मे कमी के कारण आस-पास के जन-जीवन प्रभावित होने लगा है। शहरों और कैंनटोनमेंट जोन में पानी की सप्लाई की वजह से जंगल और यहां के आस-पास के इलाकों में बसे लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, एक महिला की बसंती देवी की पहल ने इसको बदलने का प्रयास किया। उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया जिससे पर्यावरण के प्रति लोग जागरुक हुए।

दरअसल, बसंती ने अखबारों में उत्तराखंड की जल, जंगल, ज़मीन के विषय में अखबारों में पढ़ा था। उन्होंने देखा कि जिस तरह से लोग कोसी नदी का इस्तेमाल कर रहे हैं ऐसे में 10 साल में इसका पानी पूरी तरह से सूख जाएगा। इसपर बसंती ने निर्णय लिया कि उत्तराखंड की ‘जल, जंगल, ज़मीन’ को किसी भी हाल में बचाएंगी।

बसंती ने इसके लिए अपनी दोस्त पार्वती गोस्वामी का सहारा लिया। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले वनों की कटाई रोकने का फैसला लिया। इसके लिए उन्होंने महिलाओं को जागरुक करने का बियान चलाया।

जानकारी के मुताबिक, वे पेड़ काटने वाली महिलाओं के पास जाती और उन्हें अखबारों में छपी खबरों को दिखाती। उन्होंने इलाके की महिलाओं को इकट्ठा किया और उन्हें पर्यावरण की महत्वता के विषय में समझाया। उन्हें इस बात से रुबरु करवाया कि वे जो कर रहे हैं उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ी के लिए कितना घातक साबित हो सकता है।

बसंती देवी की इन बातों ने उन महिलाओं को प्रभावित किया और उन्होंने वन जीवों को काटने से इनकार कर दिया और उन्हें संरक्षित करने का फैसला किया। इसके अलावा महिलाओं ने इस बात पर भी ध्यान देना शुरु किया कि कोई भी अन्य व्यक्ति बाहर से आकर पेंड़ ना काटे। कई सालों तक चलाए गए इस अभियान ने कोसी नदी की काया पलट कर दी। आस-पास हरे-भरे जंगल हैं। इनमें बांज और काफ़ल के हरे-भरे पेड़ हैं।

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