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24 साल की उम्र में इस डॉक्टर लड़की ने संभाला सरपंच का पद, बदल रही गांव की काया

आजादी के 75 साल बाद भी देश में कई ऐसे गांव मौजूद हैं जहां के लोग घर की महिलाओं को चूल्हे-चौके तक सीमित रखने की कसम खाए बैठे हुए हैं। ऐसे लोगों का मानना होता है कि स्त्रियों का घर से निकलना अच्छी बात नहीं होती है, घर की इज्जत घर में ही अच्छी लगती है। यही कारण है कि ऐसे क्षेत्रों की महिलाएं रुढ़िवादिता का शिकार हो जाती हैं और वे आजीवन अपने मूलभूत अधिकारों को भी तरसती हैं।

हालांकि, शहर का जीवन इससे परे होता है। यहां माता-पिता अपने बच्चों में समानता का भाव रखते हैं। उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाते हैं, उनका पालन-पोषण अच्छे से करते हैं जिसकी नतीजा ये रहता है कि वे भविष्य में एक अच्छे इंसान बनकर तैयार होते हैं। बहरहाल, आज हम आपको एक ऐसी महिला के विषय में बताने जा रहे हैं जिसने अपने दादाजी द्वारा चलाई जा रही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गांव की सरपंची संभाल ली है। उसने कसम खाई है कि गांव का कायापलट करके ही दम लेगी।

इस महिला का नाम शहनाज़ खान है। वैसे तो इनका लालन-पालन शहर में हुआ है लेकिन ये रहने वाली राजस्थान के भरतपुर के एक छोटे से गांव कामा की हैं। इस गांव में हाल ही में सरपंच पद के लिए चुनाव संपन्न हुए थे जिसमें शहनाज़ ने 195 वोटों से अपने प्रतिद्वंदी को हराकर जीत हांसलि की। अब वे कामा की सरपंच बन गई हैं। उनका दावा है कि वे गांव की स्थिति को सुधारने के लिए भरसक प्रयास करेंगी जो जल्द ही जमीन पर दिखेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबि, 24 वर्षीय शहनाज़ पेशे से डॉक्टर हैं। उन्होंने शहर में रहकर एमबीबीएस की डिग्री हांसिल की इसके बाद उन्होंने अपने गांव का रुख किया।

महिलाओं की स्थिति को देखकर भावुक हुईं शहनाज़

बताया जाता है कि शहनाज़ छुट्टियों में अपने माता-पिता के साथ गांव आया करती थीं। वे अक्सर देखती थीं कि यहां की महिलाएं हमेशा घर काम में ही उलझी रहती थीं। उन्हें कभी खुद के लिए फुर्सत ही नहीं मिलती थी। एक बार शहनाज़ ने अपने दादाजी से इनकी शिक्षा-दिक्षा को लेकर सवाल भी किया था लेकिन बदले में उन्हें जो जवाब सुनने को मिला उससे उनके रौंगटे खड़े हो गए। उनके दादाजी ने कहा कि मेवात के इस क्षेत्र में आपराधिक घटनाएं बहुत अधिक होती हैं इसलिए महिलाओं का घर से निकलना अच्छी बात नहीं होती है। उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें घर में ही दाब के रखा जाता है। वे घर कामों में ही अच्छी लगती हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2017 में शहनाज़ के दादाजी ने इस गांव में सरपंच पद को लेकर हुए चुनावों में भाग लिया, जिसमें वे जीत गए। हालांकि, कोर्ट ने उनकी जीत को खारिज कर दिया। जिसके बाद दोबारा चुनाव हुए। इस बार घरवालों ने शहनाज़ को मौका दिया। इसका नतीजा ये रहा कि गांववासियों ने शहनाज़ को कामा के सरपंच के रुप में चुन लिया।

महिलाओं को दिलाएंगी शिक्षा का अधिकार

अब जब वे सरपंच बन गई हैं तो उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। उन्हें अपने गांव के सुधार के लिए काम करना पड़ेगा। शहनाज़ ने इसी विषय में बात करते हुए बताया कि, वे सबसे पहले गांव की महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाएंगी। वे “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” तथा “सर्व शिक्षा अभियान” के बारे में अपने गाँव के लोगों को जागरूक कर के हर घर तक शिक्षा पहुँचाएंगी। इसके अलावा वे रोजगार को लेकर भी नए-नए उपाय इजात करेंगी।

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