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जानिये कौन हैं शांतनु नायडू जिन्होंने रतन टाटा को बना लिया है अपना मुरीद?

रतन टाटा एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें किसी परिचय की जरुरत नहीं है। टाटा लाखों बिजनेसमैन्स द्वारा आइकन माने जाते हैं। उनकी हर एक बात लोगों को कुछ न कुछ सिखाती है। टाटा ने अपनी कंपनी के साथ-साथ जरूरतमंदों की मदद करने के लिए अपने कदम हमेशा आगे रखे हैं।

कौन हैं रतन टाटा के साथ रहने वाले शांतनु नायडू?

शांतनु का जन्म पुणे, महाराष्ट्र में 1993 को हुआ था। शांतनु अपनी छोटी सी उम्र में वहां तक पहुंच गए हैं जहां पर लोगों को पहुचने में अपना पूरा जीवन लग जाता है। इस समय शांतनु टाटा ट्रस्ट में डिप्टी जनरल मैनेजर हैं। उनहोंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है। टाटा कंपनी में काम करने वाले वह अपने परिवार की 5वीं पीढ़ी हैं। इससे पहले उनके पूर्ज टाटा ग्रुप के लिए कार्य किया करते थे।

घायल जानवर को देखकर भावुक हुए शांतनु

उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि ग्रैजुएशन खत्म करने के बाद साल 2014 में उन्होंने टाटा ग्रुप ज्वाइन कर लिया था। एक शाम शांतनु जब अपना काम करके घर लौट रहे थे तो उन्होंने सड़क के बीच एक कुत्ते को देखा, वह पूरी तरह से घायल था। कुत्ते को इस हालत में देखकर शांतनु को बहुत दुख हुआ। जिसके बाद उन्होंने उस कुत्ते को अस्पताल पहुंचाया। इस घटना ने शांतनु को अंदर से झकझोर कर रख दिया था।

इसके बाद उन्होंने अपने दोस्तों की मदद से कुत्तों के लिए रिफलेक्टर्स लगे हुए कॉलर डिजाइन किये। इसके बाद उन्होंने कई स्ट्रीट डॉग्स को कॉलर पहनाए। शांतनु द्वारा किए गए इस काम के बाद उनके हर तरफ चर्चे होने लगे थे। यहां तक कि टाटा ग्रुप ऑफ कंपनीज के न्यूजलेटर में भी उनके इस कारनामे को छापा गया था।

धीरे-धीरे उनके द्वारा खरीदे गए कॉलर प्रसिद्ध होने लगे थे। लोग उन्हें खरीदने की चाहत रखने लगे थे। हालांकि, पैसों के अभाव में वे बड़ी मात्रा में इसका प्रोडक्शन नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में शांतनु के पिता ने अपने बेटे को रतन टाटा को खत लिखने की सलाह दी। पिता की सलाह मानते हुए उन्होंने एक चिट्ठी लिखी और टाटा ग्रुप के चेयरमैन को भेज दी।

टाटा ने बुलाया ऑफिस

समय बीतता गया और 2 महीने हो गए। शांतनु भी इस बात को भूल गए थे। लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद उनकी जिंदगी ही बदल गई। दरअसल, शांतनु को खत लिखने के ठीक 2 महीने बाद टाटा द्वारा साइन किया हुआ एक खत मिला। उस खत में लिखा था कि उनके काम से टाटा बेहद खुश हुए हैं और उनसे मिलना चाहते हैं। कुछ दिनों बाद वे टाटा से मिलने गए। उन्होंने वहां पहुंचकर अपने काम के विषय में उन्हें जानकारी दी जिसके बाद टाटा ने उन्हें प्रमोशन के साथ-साथ अपने काम के लिए फंड भी दिया।

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