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अद्भुत! पत्थरों के टकराने से निकलती है डमरु की आवाज़, जानिये कहां स्थित है ये मंदिर

भारत को आस्था का केंद्र माना जाता है। यहां गली-गली में एक मंदिर स्थापित है, खास बात यह है कि लोग इनमें उतनी ही श्रद्धा से पूजा करने जाते हैं जितना कि किसी तीर्थ स्थल पर जाते हैं। कई लोग अपने आस-पास स्थित मंदिर को चमत्कारी या रहस्यमयी भी मानते हैं। यही कारण है कि देश में मंदिरों की संख्या अधिक है।

बहरहाल, आज हम आपको देश के एक ऐसे मंदिर के विषय में बताने जा रहे हैं जिसमें पत्थरों के आपस में टकराने पर डमरु की आवाज़ आती है। हिमाचल प्रदेश के सोलन के जटोली गांव स्थित जटोली शिव मंदिर एशिया के सबसे विशाल मंदिर में से एक है। इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

मंदिर की भव्यता के हैं चर्चे

माना जाता है कि इस पवित्र धाम की नींव स्वामी कृष्णानंद परमहंस महाराज द्वारा की गई थी। इस मंदिर का नाम ‘जटा’ से लिया गया है जो भोलेनाथ की लंबी जटाओं से संबंधित है। मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। खूबसूरत बगीचों और फुलवारियों के बीच स्थित यह मंदिर भक्तों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। इस मंदिर में एक प्राकृतिक शिव गुफा भी है जिसके दर्शन के लिए दूर-दराज से भक्त यहां आते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिमाचल का यह जटोली गांव काफी पवित्र तीर्थ स्थल है। कहा जाता है कि युगों पहले भगवान शिव इस जगह पर आए थे और कई वर्षों तक उन्होंने यहां तपस्या की थी। बस तभी से इस स्थान का महत्व बढ़ गया और इसे भोलेनाथ का पवित्र तीर्थ स्थल माना जाने लगा है।

मंदिर निर्माण में लगा 39 साल का समय

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1950 में स्वामी कृष्णानंद परमहंस इस स्थान पर आए थे। उन्होंने जटोली गांव में मंदिर की स्थापना की थी। मंदिर का काम पूरा होने में लगभग 39 साल का समय लगा। हालांकि, इससे पहले ही स्वीमा कृष्णानंद ब्रह्मलीन हो गए।

बात करें इस मंदिर की तो इसमें स्फटिक मणि शिवलिंग के साथ-साथ माता पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और हनुमान जी की भी मूर्तियां स्थापित की गई हैं। दक्षिण-द्रविड़ शैली से तैयार किया यह मंदिर एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है।

111 फीट ऊंची शिव की प्रतिमा

मंदिर में 11 फीट लंबी शिवलिंग की स्थापना की गई है। इसके अलावा एक विशालकाय सोने का कलश भी स्थापित किया गया है। जानकारी के अनुसार, इस मंदिर की ऊंचाई करीब 111 फीट है जिसके दर्शन के लिए लगभग 100 सीढ़ियों की मदद लेनी पड़ती है।

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