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लुधियाना का यह वकील जिसने झुग्गियों में रहने वाले लड़कों को पकड़ाई किताबें, कभी रोड पर कूड़ा उठाते थे ये बच्चे

जिंदगी में जहां कुछ लोग केवल अपने बारे में सोचते हैं.और अपनी जिंदगी सुधारने के लिए दिन रात मेहनत करते है. वहीं दूसरी ओर कुछ इंसान ऐसे भी होते है जो न सिर्फ केवल अपनी जिंदगी के बारे में सोचते हैं .बल्कि वह दूसरों की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए भी कुछ अहम भूमिका निभाते हैं.और हम बात कर रहे हैं एक ऐसे इंसान की जिसने झुग्गी में रहने वाले बच्चों के हाथ से कूड़ा छीन कर किताबें पकड़ा दी.हम बात कर रहे हैं लुधियाना के रहने वाले हरिओम जिंदल की.

1966 में हुआ जन्म

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हरिओम का जन्म 9जून 1966 ko लुधियाना में हुआ था.हरिओम के मुताबिक उनके पिता का नाम सुदर्शन था .जो एक कारोबारी के रूप में जाने जाते थे.लेकिन इनके पिता को अचानक कारोबार में नुकसान हो गया.और आनन फानन में लुधियाना से फिरोजपुर शिफ्ट होना पड़ा .लेकिन हरिओम ने बताया की मेरे पिताजी भी ही पिता की तरह मेरी जिंदगी बेहतर बनाना चाहते थे.लेकिन कारोबार में अचानक नुकसान की वजह से और फिरोजपुर शिफ्ट होने की वजह से उनकी मैट्रिक की पढ़ाई गांव में ही हुई थी.लेकिन उन्होंने आगे बताते हुए कहा की किसी तरह भी उन्होंने गांव से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया.

कठिन समय से जूझ रहे थे हरिओम

बता दें की यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद हरिओम की जिंदगी बेहतर नहीं चल रही थी.क्योंकि इनके पिता का बिजनेस डूबने के कारण इनका परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था.और ऐसे में हरिओम के सामने बड़ी चुनावती थी के वह परिवार की मदद कैसे करें.इसलिए हरिओम ने पढ़ाई के साथ साथ छोटी मोटी नौकरियां की जिससे कुछ पैसे इकट्ठे हो सके .और हरिओम ने अपने ऊपर भी कम पैसे खर्चना शुरू कर दिए.लेकिन हरिओम की जिंदगी तब पटरी पर आई जब उन्होंने आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय शिपिंग का कारोबार शुरू किया.अब हरिओम की जिंदगी सब पहले जैसा होने लगा.मगर हरिओम के दिल में कुछ था जो उनको परेशान कर रहा था.

झुग्गी के बच्चे को पकड़ाई किताबें.

अक्सर हम देखते हैं. की झुग्गी में रहने वाले लोग की जिंदगी काफी अच्छी नहीं होती है.और वह अच्छी जिंदगी नहीं जी पाते.ऐसे में हरिओम कहते हैं.मैं कसर इन बातों को सोचकर परेशान होता हूं की मेरे पास जब मां बाप थे तो मेरे जीवन में कितनी कठिनाइयां थी लेकिन जिसके मां बाप ही नहीं उनका क्या.इसलिए मैने अपना कारोबार छोड़ 44 की उम्र में कानून की पढ़ाई कर रहा हूं.ताकि झुग्गी में रहने वाले बच्चों को उनके अधिकार के बारे में पढ़ा सकूं.मैं अब झुग्गी के बच्चों के लिए स्कूल चला रहा हैं.जिसमे लगभग सैकड़ों बचे पढ़ते हैं.और इनमे अधिकतर वो बच्चे हैं जो झुग्गियों में रहकर कूड़ा बिनते थे.

बच्चों को पढ़ाते है कानून की पढ़ाई.

बता दें की हरिओम बच्चों के ए फॉर एप्पल नही बल्कि कानून की पढ़ाई करवाते हैं.वह बच्चों को संविधान की पढ़ाई करवाते हैं.ताकि बच्चे अपने अधिकारों के बारे में जान सके .और इतना ही नही हरिओम बच्चों को कंप्यूटर भी सिखाते हैं.इसके लिए उन्होंने कंप्यूटर सेंटर भी खोल रखा है.

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