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73 की उम्र में मातंगी हाजरा ने आजादी की खातिर सीने पर खाई थी गोली, लेकिन तिंरगा नहीं झुकने दिया

क्या आपने कभी सोंचा है कि आज हम किसी भी जगह पर स्वतंत्रता से कैसे घूम लेते हैं? हमसे कोई सवाल क्यों नहीं करता है? इसका जवाब है आजादी। वो आजादी जिसे तमाम स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहूती देकर हांसिल किया है।

इन वीर सपूतों ने अपने जीवन की रक्षा ना करते हुए भारत के आने वाले कल के विषय में सोंचा और हम सबको विरासत में गुलामी से मुक्ति देकर गए। मगर अफसोस आज भी हम आजादी की महत्वता को नहीं समझते हैं। आज देश की जनता पाश्चात्य संस्कृति से इतना प्रभावित हो रही है कि अपनी मातृभाषा तक बोलने में लोगों को शर्म आती है। शायद इन नादानों को यह नहीं पता कि हिंदी ने ही जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे देश को एक ही सूत्र में पिरोकर रखा है।

बहरहाल, आज हम आपको एक ऐसी महिला के विषय में बताने जा रहे हैं जिसने अंग्रेजों से अकेले ही लोहा मोल ले लिया था। आजादी के खातिर उन्होंने अपनी जान देना मंजूर किया लेकिन तिरंगा नहीं झुकने दिया। इस महान स्त्री का नाम मातंगिनी हाज़रा था। 19 अक्टूबर 1870 को पश्चिम बंगाल के होगला गांव में इनका जन्म हुआ था। 12 साल की उम्र में मातंगिनी की शादी 60 साल के जमींदार त्रिलोचना हाज़रा से कर दी गई थी। जब मातंगिनी 18 वर्ष की हुईं तब उनके पति का देहांत हो गया और वे विधवा हो गईं।

इसके बाद वे अपने पिता के घर लौट आईं। यहां रहकर वे जरुरतमंदों की मदद करती थीं। अब तक पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ तेज़ होने लगी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1905 में मातंगिनी हाज़रा ने आजादी की लड़ाई में भाग लिया। इसकी प्रेरणा उन्हें महात्मा गांधी से मिली। इसके बाद उन्होंने महात्मा गांधी के साथ कई आंदोलनों में भाग लिया और अंग्रेजों का जमकर विरोध किया। ऐसा करने पर कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। धीरे-धीरे वे बूढ़ी होती जा रही थीं लेकिन पूर्ण स्वराज लेने का उनका सपना और जवान होता जा रहा था।

जानकारी के मुताबिक, 1933 में मेदिनीपुर में अंग्रेजों के खिलाफ एक मार्च निकाला गया था। इस मार्च में मातंगिनी भी शामिल थीं। जैसे ही लोगों का काफिला उस वक्त के गवर्नर सर जॉन एंडरसन के घर के बाहर पहुंचा, तभी मातंगिनी ने अपना बैनर उपर किया और जोर से नारा लगाया ”लाट साहिब वापस जाओ”।

इसके बाद गवर्नर ने उनपर लाठीचार्ज के आदेश दे दिए और मातंगिनी को 6 महीनों के लिए जेल में बंद कर दिया। लेकिन उनका हौंसला अभी भी कम नहीं हुआ। जेल रिहा होने के बाद भी वे लगातार अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन करती रहीं।

साल 1942 में मातंगिनी ने तामलुक पुलिस स्टेशन को अंग्रजों के कब्जे से रिहा कराने के लिए मार्च निकाला। इस मार्च में उनके साथ 6000 प्रदर्शनकारी शामिल हुए। अंग्रेजों को इस बात की भनक लगी तो उन्होंने मातंगिनी का रास्ता रोकने की कोशिश की और धमकी दी कि वापिस ना जाने पर गोली मार देंगे।

इस पर 73 वर्षीय मातंगिनी आगे बढ़ी और विनम्रता से उन अफसरों से गोली ना चलाने की अपील की। लेकिन उन्होंने एक ना सुनी और तीन गोली मातंगिनी के ही दाग दी। गोली लगते ही मातंगिनी घायल होकर सड़क पर गिर गईं। इस दौरान उनके हाथ में तिरंगा था, जिसे घायल होने के बावजूद उन्होंने झुकने नहीं दिया। कुछ देर बाद इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने दम तोड़ दिया और शहीद हो गईं।

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