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इस गांव में पहुंचते ही आने लगती हैं नींद, जानिये क्या है यहां की आबो-हवा का राज़

आज की दौड़ भाग भरी इस जिंदगी में हर इंसान का सबसे प्रिय कार्य सोना ही होता है। आप जब भी किसी काम-धंधे वाले व्यक्ति से छुट्टी के विषय में पूछेंगे तो उसका जवाब सोना ही होगा। हर कोई अपनी छुट्टियों का प्लान तैयार करके रखता है।

लेकिन कई बार घर के लोग हमें सोने नहीं देते हैं। कभी बच्चों का रुदन तो कभी माता-पिता की चिक-चिक हमारी नींद में बाधा उत्पन्न करती है। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे गांव के विषय में बताने जा रहे हैं जहां की आवो-हवा आपको सोने पर मजबूर कर देगी। जी हां, कजाकिस्तान का कलाची गांव इन दिनों काफी चर्चा में है। इसका कारण है यहां का वातावरण। लोगों का मानना है कि इस गांव की हवा में कुछ ऐसा मिला हुआ जिसकी वजह से यहां रहने वाला हर शख्स जरुरत से ज्यादा सोता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई बार सोते-सोते महीनों बीत जाते हैं लोगों को पता भी नहीं चलता है। इसके अलावा इस गांव में ऐसी भी घटनाएं हुईं है जिनमें सोते-सोते ही कई लोग दुनिया को अलविदा कह गए। ऐसे में नींद अब लोगों को आराम नहीं बल्कि हराम बनती जा रही है।

2010 में हुआ घटना का खुलासा

जानकारी के अनुसार, कजाकिस्तान का यह गांव पहले ऐसा नहीं था। साल 2010 में एक व्यक्ति शहर जाने के लिए एक दिन गांव से बाहर निकला। रास्ते में उसे नींद सी लगी, तो उसने तय किया कि वो कुछ देर बैठकर चाय-पानी कर ले फिर शहर की ओर रवाना होगा। ऐसे में उसे इतनी तेज़ नींद का झोंका आया कि वह कब सो गया उसे पता ही नहीं चला। शाम को जब वह जगा तो उसे एहसास हुआ कि वह काफी देर तक सो रहा था। इस घटना के विषय में उसने अपने मित्रों को बताया लेकिन किसी ने यकीन नहीं किया। कुछ समय बाद ऐसी ही घटनाएं अन्य लोगों के साथ घटने लगीं तब जाकर लोगों को उसकी बात पर यकीन हुआ।

पलायन को मजबूर हो रहे लोग

बताया जाता है कि शुरुआत में लोग कुछ घंटों के लिए सुध-बुध खोकर सो जाया करते थे। लेकिन अब लोग हफ्तों-हफ्तों तक सोते रहते हैं। कई बार लोग महीनों तक भी नींद के आगोश में पड़े रहते हैं जिसकी वजह से कुछ लोग कोमा में भी जा चुके हैं। ऐसे में नींद अब लोगों के लिए मौत का बुलावा बनती जा रही है। यहां के निवासी गांव छोड़ने को मजबूर हैं। स्थानीय प्रशासन भी इन्हें अन्य जगहों पर शिफ्ट करने के विषय में सोंच रहा है। हालांकि, लोगों के सामने रोजगार सबसे बड़ी समस्या बनकर उबर रहा है।

स्लीपी होलो के नाम से हैं मशहूर

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस गांव के आसपास कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन का स्तर इतना ज्यादा हो गया है कि यह प्रदूषण बनकर लोगों की सांसों में समा रहा है और यही कारण है कि वे स्लीप डिसऑर्डर का शिकार हो रहे हैं। गांव के लोगों को स्लीपी होलो के नाम से भी जाना जाता है।

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