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लखनऊ का मशहूर टुंडे कबाब! जानने लायक है 115 साल पुरानी इस दुकान का रोचक इतिहास

लखनऊ…..अदबों-आदाब का यह शहर उत्तर प्रदेश की राजधानी है। नवाबों की रियासतों के लिए प्रसिद्ध यह शहर अपने आगोश में कई ऐसी नायाब चीज़ें लिए बैठा है जिसका दुनिया में कोई तोड़ नहीं है। मुगलकाल में बने इमामबाड़ा और बुलंद दरवाज़ा आदि के विषय में तो आप सबने ने पहले भी कई बार सुना ही होगा लेकिन आज हम आपको इस शहर की एक ऐसी प्रसिद्ध चीज़ के विषय में बताने जा रहे हैं जिसकी पहचान देश ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में है।

जो लोग….लखनऊ गए हैं….या लखनऊ से वास्ता रखते हैं उन्होंने कभी न कभी टुंडे के कबाब नामक दुकान के बारे में तो जरुर ही सुना होगा। पूरे लखनऊ की शान टुंडे के कबाब अपने उम्दा और चटपटे स्वाद के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। अकबरी गेट के पास बनी छोटी सी दुकान पर दिन-रात लोगों की भीड़ जमा रहती है। यहां देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी पर्यटक बेहतरीन कबाब का स्वाद चखने के लिए आते हैं।

1905 में रखी गई थी नींव

बता दें, इस दुकान के मालिक का नाम रईस अहमद है। इनके पुरखे या यूं कहें कि दादाजान हाजी साहब द्वारा इस दुकान की शुरुआत आज से ठीक 115 साल पहले की गई थी। साल 1905 में टुंडे कबाब नाम से हुई शुरुआत आज वर्ल्ड बेस्ट कबाब सेंटर्स में शुमार है। इसकी तारीफ बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख खान से लेकर खेल जगत के उम्दा सितारे सुरैश रैना तक सभी कर चुके हैं।

नॉनवेज लवर्स के पसंदीदा स्टोर की शुरुआत से पहले रईस मियां के दादाजान हाजी साहब भोपाल की रियासत के नवाब के खानसामा हुआ करते थे। नवाब साहब को कबाब खाने का बड़ा शौक था हाजी साहब उनके लिए स्वादिष्ट कबाब बनाते और उनका दिल खुश करते।

उम्र के साथ नवाब साहब ने दांत तो खो दिए थे लेकिन कबाब का शौक उनका पीछा ही नहीं छोड़ रहा था। उनकी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए खानसामे ने गरिष्ठ कबाब तैयार किए। इसमें उन्होंने मांस को बारीक पीस लिया और उसे मसालों के साथ मिलाकर तैयार किए कबाब।

यह सिलसिला सालों तक चलता रहा, लेकिन फिर एक वक्त ऐसा आया जब हाजी साहब को भोपाल की ज़मीं छोड़नी पड़ी और उन्होंने लखनऊ का रुख किया।

हादसे के दौरान खोया हाथ

यहां आकर रोजगार कमाने के उद्देश्य से हाजी साहब ने अकबरी गेट के पास एक छोटी सी कबाब की दुकान खोल ली। इस दुकान का नाम उन्होंने टुंडे कबाब रखा। बता दें, हाजी साहब को बचपन से पतंग उड़ाने का शौक था। एक बार वे पतंग उड़ाते-उड़ाते छत से नीचे गिर गए थे जिसकी वजह से उनका एक हाथ खराब हो गया था। डॉक्टरों ने उसे काट दिया था। तब से लोग उन्हें टुंडा कहकर बुलाते थे।

इसी से प्रेरित होकर हाजी साहब ने अपनी दुकान का नाम टुंडे कबाब रखा। कुछ समय के बाद उनकी दुकान इतनी चली कि यहां विदेशों से भी लोग आने लगे।

गोपनीय रखी जाती है कबाब की रेसिपी

कहा जाता है कि हाजी साहब ने इस कबाब को बनाने की रेसिपी अपनी बेटियों तक को नहीं बताई है। यहां तक की कबाब को तैयार करने के लिए मसालों को भी एक दुकान से नहीं खरीदा जाता है। उन्हें अलग-अलग दुकानों से ही खरीदा जाता है। इस रेसिपी के बारे में सिर्फ घर के मर्द ही जानते हैं। वे घर के एक कमरे में कबाब के मसाले को तैयार करते हैं।

गौरतलब है, हाजी साहब की यह दुकान अब उनके पोते रईस अहमद संभाल रहे हैं। दादाजान की बरसों पुरानी दुकान को आगे बढ़ाने के लिए रईस मियां दिन-रात मेहनत करते हैं।

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